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राजस्थानी साफा, पाग-पगड़ी, कला संस्थान, बीकानेर, आकाशों में उड़े म्हारौ चंदौ लक्ष्मीनाथ म्हारी सहाय करे.... गवरा दादी पून दे टाबरियों रौ चंदो उड़े.....

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3 months ago
राजस्थानी साफा, पाग-पगड़ी, कला संस्थान, बीकानेर, आकाशों में उड़े म्हारौ चंदौ लक्ष्मीनाथ म्हारी सहाय करे.... गवरा दादी पून दे टाबरियों रौ चंदो उड़े.....
राजस्थानी साफा, पाग-पगड़ी, कला संस्थान, बीकानेर, आकाशों में उड़े म्हारौ चंदौ लक्ष्मीनाथ म्हारी सहाय करे.... गवरा दादी पून दे टाबरियों रौ चंदो उड़े.....
 
बीकानेर 12 अप्रैल 2026: राजस्थानी साफा-पाग पगड़ी, कला संस्थान एवं थार विरासत की ओर से 538वें नगर स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित छः दिवसीय ‘उछब थरपणा’ के चौथे दिन आज लक्ष्मीनारायण रंगा सृजन-सदन में ‘चंदा-पाग कला के अनछुए प्रसंग’ विषयक परिसंवाद का आयोजन रखा गया है। 
परिसंवाद का विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार कमल रंगा ने चंदे का ऐतिहासिक इतिहास बताते हुए कहा कि नगर स्थापना के दिन से चंदे को जहां-जहां से उड़ाया और जहां-जहां चंदा गिरा वहां-वहां बीकानेर की सीमा (शफील) बनाई गई। रियासत काल में सभी जाति पंचायतें चंदा उड़ाती थी। जिसे मथेरन जाति के लोग बनाते थे एवं साथ ही जाति विशेष के लोग अपने इष्ट देव का चित्र भी उसमें बनवाते थे। रंगा ने आगे बताया कि पाग-पगड़ी जाति विशेष के अनुसार उसका रंग व पहनावा हुआ करता था। जो अलग-अलग जातियों एवं अंचलों में अपनी परंपरा अनुसार होता था।
इसी क्रम में चंदा-पाग कला विशेषज्ञ कृष्णचंद पुरोहित ने बताया कि चंदा बही के कागज से बनता जिसके चारों ओर लाल और केसरिया रंग का कपड़ा लगाकर सरकंडे के साथ सूर्य जैसा गोल आकृति का चंदा बनता था। यह विरासत आज भी अपने आप में अनूठी है।
इस अवसर पर युवा कवि पुनीत कुमार रंगा ने ऐतिहासिक प्रसंग बताते हुए कहा कि नगर स्थापना के दिन राव बीकाजी द्वारा 22 गज की पगड़ी के 7 फीट का चंदा बनवाकर आकाश में उड़ाकर यह संदेश दिया कि बीकानेर की यश-कीर्ति अनंतकाल तक अक्षुण रहेगी। साथ ही उस दौर में चंदा हर घर में उड़ाया जाता था कोई उसे फाड़ता चोरी नहीं करता था। यदि वह ऐसा करता तो उसे राजा द्वारा दंडित करके जुर्माने के रूप में एक रूपया लिया जाता था। 
इस अवसर पर कला विशेषज्ञ डॉ. राकेश किराडू एवं मोना सरदार डूडी ने कहा कि रियासत काल में चंदा उड़ाने की परंपरा से जुड़े लोक के गीत/दोहे आज भी नगर स्थापना चंदा उड़ाने की परंपरा के साथ बोले जाते है जैसे- आकाशों में उड़े म्हारौ चंदौ लक्ष्मीनाथ म्हारी सहाय करे..../गवरा दादी पून दे टाबरियों रौ चंदो उड़े...के साथ चंदों पर राजा के यश की गाथा होती थी। परंतु समकालीन दौर में चंदे के माध्यम से वर्तमान समस्याएं यथा-चाईनीजे मांझे का बहिष्कार, पर्यावरण, जीव रक्षा, स्थापत्य कला के चित्र आदि के माध्यम से संदेश देते हुए चंदा बनाया एवं उड़ाया जा रहा है। 
इस अवसर पर गोपीकिशन छंगाणी, गौरीशंकर व्यास, मोहित पुरोहित, आशीष रंगा, अशोक शर्मा, राहुल आचार्य, धर्मेन्द्र छंगाणी, मनमोहन पालीवाल, मरूधरा बोहरा, तोलाराम सारण, अख्तर अली, कन्हैयालाल, चंपालाल गहलोत, सोहन मोदी, भंवर मोदी सहित अनेक गणमान्य लोगों ने उत्साह और उमंग के साथ सहभागिता निभाते हुए बीकानेर की चंदा व साफा कला परंपरा से जुड़े अनछुए प्रसंगों का आनंद लिया।
परिसंवाद का संचालन राजेश रंगा ने किया एवं सभी का आभार हरिनारायण आचार्य ने ज्ञापित किया।

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