Khulasa Online
Breaking
• बीकानेर: अचानक पैर फिसल कर गिरा व्यक्ति, टांके में डूबने से हुई मौत • बड़ी खबर: निर्माणाधीन पुल का स्लैब गिरा, 6 मजदूरों की मौत, 3 को सुरक्षित निकाला गया • सुप्रीम कोर्ट सख्त: खतरनाक कुत्तों को दे मौत का इंजेक्शन! अधिकारियों को दिए निर्देश • NEET पेपर लीक मामले में पुणे का केमेस्ट्री प्रोफेसर गिरफ्तार, CBI ने बताया मास्टरमाइंड • मौसम अपडेट: मानसून तय समय से पहले देगा दस्तक, जाने राजस्थान में कब होगी झमाझम बारिश • बीकानेर: अचानक पैर फिसल कर गिरा व्यक्ति, टांके में डूबने से हुई मौत • बड़ी खबर: निर्माणाधीन पुल का स्लैब गिरा, 6 मजदूरों की मौत, 3 को सुरक्षित निकाला गया • सुप्रीम कोर्ट सख्त: खतरनाक कुत्तों को दे मौत का इंजेक्शन! अधिकारियों को दिए निर्देश • NEET पेपर लीक मामले में पुणे का केमेस्ट्री प्रोफेसर गिरफ्तार, CBI ने बताया मास्टरमाइंड • मौसम अपडेट: मानसून तय समय से पहले देगा दस्तक, जाने राजस्थान में कब होगी झमाझम बारिश
jeevan raksha
Sambhav Hospital
Bansal Group
Bharti

प्रतिष्ठा, परिवार और संतानों का दायित्व -रामेश्वर लाल बिश्नोई

rk
6 hours ago
प्रतिष्ठा, परिवार और संतानों का दायित्व -रामेश्वर लाल बिश्नोई

खुलासा न्यूज,बीकानेर। माता-पिता को संतान की प्रथम गुरु कहा और माना जाता है। वे अपने जीवन के संघर्ष, त्याग और अनुभवों के आधार पर परिवार की नींव तैयार करते हैं। उनकी प्रतिष्ठा, चरित्र और सामाजिक सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं होते, बल्कि पूरे परिवार की धरोहर होते हैं। ऐसे में जब संतान माता-पिता के अनुभवों, सलाह और मार्गदर्शन की उपेक्षा करती है तथा उनकी प्रतिष्ठा और चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगती है, तब यह स्थिति परिवार के लिए अत्यंत दुखद और चिंताजनक बन जाती है।


हर पीढ़ी के विचारों में अंतर स्वाभाविक है। बदलते समय के साथ सोच, जीवनशैली और प्राथमिकताएं भी बदलती हैं। किंतु मतभेद और असम्मान में अंतर होता है। किसी विषय पर अलग राय रखना एक बात है, जबकि माता-पिता के व्यक्तित्व, चरित्र या नीयत पर संदेह करना दूसरी बात है। जब औलाद अपने माता-पिता के प्रति सम्मान खो देती है, तब परिवार की एकता और विश्वास की नींव कमजोर होने लगती है।

 


कहा गया है कि माता-पिता की आज्ञा का पालन करना जीवन के सबसे कठिन किंतु सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्यों में से एक है। इसका अर्थ अंधानुकरण नहीं, बल्कि उनके अनुभवों और शुभचिंतन का सम्मान करना है। जिन माता-पिता ने अपनी औलाद के पालन-पोषण, शिक्षा और भविष्य के लिए अपना जीवन समर्पित किया हो, उनके प्रति कृतज्ञता और आदर का भाव प्रत्येक संतान का नैतिक दायित्व है।


आर्थिक संकट, सामाजिक चुनौतियां और व्यक्तिगत संघर्षों का समाधान समय के साथ खोजा जा सकता है, लेकिन जब व्यक्ति को अपने ही परिवार के भीतर अविश्वास, उपेक्षा और विरोध का सामना करना पड़ता है, तब उसकी मानसिक पीड़ा कई गुना बढ़ जाती है। परिवार का सहयोग मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति होता है, जबकि पारिवारिक असहयोग उसे भीतर से तोड़ सकता है।
आज के समय में माता-पिता की जिम्मेदारी केवल बच्चों का भरण-पोषण करना नहीं है, बल्कि उनमें संस्कार, संवेदनशीलता और सही-गलत की पहचान विकसित करना भी है। यदि बच्चों के सामने परिवार के वरिष्ठ सदस्यों के प्रति निरंतर नकारात्मकता प्रस्तुत की जाए, तो उनके मन में सम्मान और विश्वास की भावना कमजोर हो सकती है। इसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार की एकता पर पड़ता है।
प्राचीन कहावत है 'चिता मृत शरीर को जलाती है, जबकि चिंता जीवित मनुष्य को जलाती है।Ó जब माता-पिता अपनी ही संतानों के व्यवहार से आहत होते हैं, तब उनके मन में उत्पन्न चिंता और पीड़ा शब्दों में व्यक्त करना कठिन हो जाता है। वृद्धावस्था में उन्हें सम्मान, सहयोग और अपनापन चाहिए होता है, न कि आरोप, उपेक्षा और तिरस्कार।
समाज के लिए सबसे बड़ा संदेश यह है कि परिवार में संवाद, सम्मान और विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। मतभेद का समाधान बातचीत से हो सकता है, लेकिन रिश्तों में आई कटुता और अविश्वास का प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है। औलाद का कर्तव्य केवल अपने अधिकारों की मांग करना नहीं, बल्कि माता-पिता के सम्मान, प्रतिष्ठा और भावनाओं की रक्षा करना भी है।
मनुष्य की वास्तविक शक्ति धन, पद या प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि उसके चरित्र, संस्कार और पारिवारिक एकता में निहित होती है। जिस परिवार में माता-पिता का सम्मान सुरक्षित रहता है, वहां प्रेम, विश्वास और समृद्धि का वातावरण भी बना रहता है। यही स्वस्थ परिवार और सशक्त समाज की आधारशिला है।

Sanskar
BC

Join for Latest News

हमारे चैनल से जुड़ें और सभी अपडेट सबसे पहले पाएँ

Share: