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मृत्यु निश्चित होने के बाद भी हम नहीं करते स्वीकार:पं व्यास

rk
6 hours ago
मृत्यु निश्चित होने के बाद भी हम नहीं करते स्वीकार:पं व्यास

मृत्यु निश्चित होने के बाद भी हम नहीं करते स्वीकार:पं व्यास

बीकानेर। श्री आदि गणेश मंदिर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन भक्ति, धर्म और मानवीय आदर्शों से जुड़े प्रेरणादायक प्रसंगों का वर्णन किया गया। इस दौरान कथा पंडाल श्याम ला गिरधारी... जैसे भजनों से गूंज उठा,जिस पर श्रद्धालु भक्तिभाव में लीन होकर झूमते रहे। कथा वाचक पं सुनील व्यास बताया कि भगवान अपने भक्तों के प्रेम, समर्पण और निष्काम भक्ति से प्रसन्न होते हैं। सच्चा भक्त वही है जो अहंकार,छल और कपट से दूर रहकर प्रभु का स्मरण करता है। व्यास ने कहा कि प्रभु जब अवतार लेते हैं तो माया के साथ आते हैं। साधारण मनुष्य माया को शाश्वत मान लेता है और अपने शरीर को प्रधान मान लेता है। जबकि शरीर नश्वर है। उन्होंने कहा कि भागवत बताता है कि कर्म ऐसा करो जो निस्काम हो वहीं सच्ची भक्ति है।कथा में भगवान नरसिंह अवतार का प्रसंग सुनाया गया,जिसमें भक्त प्रह्लाद की अटूट श्रद्धा और विश्वास का वर्णन किया गया। बताया गया कि सत्य और भक्ति की हमेशा विजय होती है तथा धर्म की रक्षा के लिए भगवान किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं। इस प्रसंग के माध्यम से संयमित और मधुर वाणी के महत्व को भी समझाया गया।महाराज ने कहा कि व्यक्ति अपने जीवन में जिस प्रकार के कर्म करता है उसी के अनुरूप उसे मृत्यु मिलती है। मनुष्यों का क्या कर्तव्य है इसका बोध भागवत सुनकर ही होता है। विडंबना ये है कि मृत्यु निश्चित होने के बाद भी हम उसे स्वीकार नहीं करते हैं। निस्काम भाव से प्रभु का स्मरण करने वाले लोग अपना जन्म और मरण दोनों सुधार लेते हैं।उन्होंने कहा कि वैराग्य मानव को ज्ञानी बनाता है। वैराग्य में मानव संसार में रहते हुए भी सांसारिक मोहमाया से दूूर रहता है। उन्होंने जीवन में सत्संग व शास्त्रों में बताए आदर्शों का श्रवण करने का आह्वान करते हुए कहा कि सत्संग में वह शक्ति है, जो व्यक्ति के जीवन को बदल देती है। उन्होंने कहा कि व्यक्तियों को अपने जीवन में क्रोध,लोभ,मोह,हिंसा,संग्रह आदि का त्यागकर विवेक के साथ श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए। व्यास पीठाधीश्वर ने भागवत कथा के दौरान कपिल चरित्र,सती चरित्र,धु्रव चरित्र,जड़ भरत चरित्र,नृसिंह अवतार आदि प्रसंगों पर प्रवचन करते हुए कहा कि भगवान के नाम मात्र से ही व्यक्ति भवसागर से पार उतर जाता है। उन्होंने भगवत कीर्तन करने,ज्ञानी पुरुषों के साथ सत्संग कर ज्ञान प्राप्त करने व अपने जीवन को सार्थक करने का आह्वान किया।

जब भगवान शिव के विवाह की झांकी निकाली गई, तो माहौल एकदम उत्सव जैसा हो गया। शिव विवाह के भजनों पर श्रद्धालु देर तक नाचते-झूमते रहे।पंडित जी ने समुद्र मंथन की कथा सुनाते हुए कहा कि जैसे समुद्र से विष और अमृत दोनों निकले थे, वैसे ही इंसान के अंदर भी अच्छे और बुरे दोनों विचार होते हैं। जब हम अपने मन का मंथन करेंगे, तभी हमें सही और गलत की पहचान होगी।रामसा व्यास के साथ आई भजन मंडली की ओर से प्रस्तुत किए गए भजनों पर श्रोता भाव विभोर होकर नाचने लगे।

Sanskar
BC

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