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सोमवती अमावस्या पर 100 साल बाद शुभ संयोग, जानें पितृ पूजन का महत्व

Bansal sadi
2 months ago
सोमवती अमावस्या पर 100 साल बाद शुभ संयोग, जानें पितृ पूजन का महत्व

सोमवती अमावस्या पर 100 साल बाद शुभ संयोग, जानें पितृ पूजन का महत्व

 साल की पहली सोमवती अमावस्या 15 जून को पड़ रही है. यह अधिक मास की सोमवती अमावस्या है. इस दिन ज्येष्ठ अधिक मास भी खत्म हो रहा है. इस दिन सूर्य देव भी मिथुन राशि में गोचर करने वाले हैं. ज्योतिषाचार्य डॉ. श्रीपति त्रिपठी के मुताबिक, यह दुर्लभ संयोग करीब 100 वर्षों के बाद बन रहा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह संयोग ईश्वर की भक्ति और पितरों के प्रति कृतज्ञता के लिहाज से बहुत अनुकूल माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन किए गए शुभ कर्म, दान-पुण्य और पूजा-पाठ का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है. यही कारण है कि श्रद्धालुओं के लिए यह दिन अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी माना जाता है.
 
सोमवती अमावस्या का महत्व
जब अमावस्या सोमवार को आती है तो इसका महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि यह दिन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है. मान्यता है कि यह तिथि जीवन में आशा और सकारात्मकता का संदेश देती है. जैसे अमावस्या के बाद चंद्रमा फिर से बढ़ना शुरू करता है. ठीक उसी तरह कठिन परिस्थितियों के बाद जीवन में सुख और प्रकाश का आगमन भी संभव होता है.

कब है सोमवती अमावस्या?
अमावस्या तिथि की शुरुआत 14 जून को दोपहर 12 बजकर 20 मिनट पर होगी और इसका समापन 15 जून 2026, सोमवार को सुबह 8 बजकर 24 मिनट पर होगा. उदिया तिथि के आधार पर 15 जून को सोमवती अमावस्या मनाई जाएगी. चूंकि इस दिन सोमवार है, इसलिए इसे विशेष रूप से शुभ और पुण्य फलदायी माना गया है.

सोमवती अमावस्या का शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 04.02 बजे से सुबह 04.42 बजे तक
गोधुली मुहूर्त- शाम 07.17 बजे से शाम 07.37 बजे तक

पितृ पूजन
भारतीय संस्कृति में पितृ स्मरण को विशेष स्थान दिया गया है. अमावस्या के दिन तर्पण और श्राद्ध के माध्यम से पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है. माना जाता है कि मनुष्य का वर्तमान उसके पूर्वजों और परिवार की कई पीढ़ियों के योगदान से जुड़ा होता है. पितरों के प्रति श्रद्धा केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है. उनके आदर्शों का पालन करना, परिवार में प्रेम बनाए रखना और सदाचारपूर्ण जीवन जीना भी सच्ची पितृ सेवा मानी जाती है.

दान और सेवा का विशेष महत्व
शास्त्रों में इस दिन दान को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है. हालांकि दान का अर्थ केवल वस्तुएं देना नहीं है. किसी भूखे को भोजन कराना, जरूरतमंद की सहायता, प्यासे को जल देना या किसी दुखी व्यक्ति को सांत्वना देना भी दान का ही स्वरूप माना गया है. धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो इस दिन करुणा, सेवा और सहयोग की भावना को बढ़ावा देने का विशेष महत्व बताया गया है. किसी जरूरतमंद के जीवन में उम्मीद की किरण बनना भी एक श्रेष्ठ धार्मिक कार्य माना गया है.

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