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जातिसूचक गालियां निकालने के आरोप में बिजली  निगम कर्मचारियों के विवाद में याचिका खारिज

Bansal sadi
3 months ago
जातिसूचक गालियां निकालने के आरोप में बिजली  निगम कर्मचारियों के विवाद में याचिका खारिज


जातिसूचक गालियां निकालने के आरोप में बिजली  निगम कर्मचारियों के विवाद में याचिका खारिज
 बीकानेर। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के कर्मचारियों के बीच हुए विवाद से जुड़े एक पुराने मामले में कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए परिवादी मनसुख करेला की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि विभागीय कार्यवाही और प्रशासनिक आदेशों को हर स्थिति में आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब लोक सेवकों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति ही प्राप्त नहीं की गई हो।
मामले के अनुसार परिवादी मनसुख करेला ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2013 में स्थानांतरण के बाद बीकानेर कार्यालय में जॉइनिंग के दौरान अधिकारियों ने उसे जातिसूचक टिप्पणियां कीं, हाजिरी रजिस्टर में हस्ताक्षर नहीं करने दिए तथा मिलीभगत से उसका मुख्यालय बदलकर दूरस्थ साइट पर कर दिया। परिवादी ने यह भी आरोप लगाया कि उपस्थिति रजिस्टर में बाद में हेरफेर की गई और उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त किया गया।
इन आरोपों के आधार पर परिवादी ने अधिकारियों एस.के. अग्रवाल सहित अन्य के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं तथा एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग की थी। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने 21 जनवरी 2017 को परिवाद खारिज कर दिया था, जिसके खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की गई।
अतिरिक्त सेशन न्यायाधीश राजेश कुमार गजरा ने 27 मई 2026 को पारित आदेश में कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि विवाद मूल रूप से विभागीय और प्रशासनिक प्रकृति का था। कोर्ट ने माना कि आरोपित अधिकारी लोक सेवक थे और उनके खिलाफ कथित कृत्य सेवा दायित्वों के निर्वहन से जुड़े थे। ऐसे मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत अभियोजन स्वीकृति आवश्यक होती है, जो इस मामले में प्राप्त नहीं की गई।
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि एससी-एसटी सेल तथा विभागीय जांचों में परिवादी के आरोपों को आधारहीन और असत्य पाया गया था। कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि परिवादी द्वारा उच्च अधिकारियों को लिखी गई प्रारंभिक शिकायतों में जातिसूचक गालियों का उल्लेख नहीं था।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पुनरीक्षण कोर्ट अपीलीय कोर्ट की तरह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकती और केवल तभी हस्तक्षेप संभव है जब ट्रायल कोर्ट का आदेश स्पष्ट रूप से अवैध, मनमाना या रिकॉर्ड के विपरीत हो।
इन्हीं कारणों से कोर्ट ने मनसुख करेला की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।

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