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तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम का समापन, भौतिक सुख अस्थाई जबकि आध्यात्मिक सुख स्थाई

Bansal sadi
6 hours ago
तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम का समापन, भौतिक सुख अस्थाई जबकि आध्यात्मिक सुख स्थाई

खुलासा न्यूज,बीकानेर। पर्यावरण पोषण यज्ञ समिति एवं आरएसवी गु्रप ऑफ स्कूल्स  के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम के अंतिम दिन आज प्रात: कार्यक्रम का प्रारंभ यज्ञ से हुआ। इसके पश्चात स्वामी विवेकानंद जी ने उपस्थित दर्शकों से संवाद करते हुए यज्ञ के महत्व को स्पष्ट किया। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में यज्ञ का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है।

 

आज के युग में सभी कार्यों की सीमा निर्धारित है जैसे खाने, पीने, सोने,  मनोरंजन आदि सभी कार्य नियमित समय में पूर्ण करने पड़ते हैं इसी प्रकार भौतिक सुखों को निश्चित समय तक ही उपयोग में लिया जा सकता है जबकि आध्यात्मिक सुख की कोई सीमा नहीं होती हैं। वेदों का अध्ययन, अच्छी पुस्तकों को पढऩा भौतिक सुखों से उत्तम है। इंद्रियों से प्राप्त होने वाला सुख विद्या से प्राप्त होने वाले सुख से बहुत कम है क्योंकि  भौतिक सुख से राग,द्वेष बढ़ता है जबकि वेदों के अनुसार इंद्रियों के एक सुख के साथ चार दु:ख भी प्राप्त होते हैं।

 

ईश्वर का ध्यान करने से आध्यात्मिक सुख में वृद्धि होती है। ईश्वर को समझना अत्यंत आवश्यक है, ईश्वर की विशेषताओं का ज्ञान एवं लक्षणों को पहचाना होगा।जो वस्तु जैसी है उसे वैसा मानना आस्था है तथा उसकी कल्पना करना अंधविश्वास है। एकाग्र होकर ईश्वर का ध्यान करें, उस समय सिर्फ और सिर्फ आपके चित् में ईश्वर ही होना चाहिए। अपनी सोच सदैव सकारात्मक रखें।अन्य की सफलता को देखकर विचलित ना हो आपके लिए भी जीवन में सफलता के अनेकों अवसर उपलब्ध हैं। सभी को समस्त सुख सुविधाएं मिलना संभव नहीं है। आपका जीवन अत्यंत मूल्यवान है इसे व्यर्थ ना करें ।संपूर्ण विश्व में अनेकों प्राणी है किंतू  बुद्धि सिर्फ मनुष्य के पास ही है  फिर भी वह आत्महत्या करने के लिए प्रेरित होता है जबकि अन्य कोई प्राणी ऐसा नहीं करता इस पर विचार करना आवश्यक है। ईश्वर एक है,सर्वव्यापी है, निरंकारी है, चैतन्य है,न्यायकारी है, आनंदस्वरूप  है ।ईश्वर के बारे में जैसे-जैसे हम जानकारी प्राप्त कर अपने ज्ञान में वृद्धि करेंगे उसके प्रति हमारी श्रद्धा बढ़ती जाएगी तथा हमारे दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन आएगा। छोटी-छोटी बातों पर दुखी नहीं होना चाहिए, अपने व्यवहार पर सदैव नियंत्रण रखना चाहिए।प्रत्येक  व्यक्ति की बुद्धि अलग-अलग होता है वह अपनी बुद्धि अनुसार ही कार्य
करता है।यदि आपको किसी बात पर क्रोध आए तो उसे मन में ना रखें अन्यथा क्रोध बुद्धि का विनाश  करता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने सामर्थ्य  अनुसार निष्काम कर्म अवश्य करने  चाहिए। कार्यों की प्राथमिकता तय करने के पश्चात ही कार्यों को संपन्न करें तभी आप अपने तनाव पर नियंत्रण कर सकते हैं। स्वामीजी ने उपस्थित  जिज्ञासुओं के प्रश्नों का तार्किक रूप से समाधान किया।उपस्थित प्रबुद्ध श्रोताओं ने इस प्रकार के संवाद को अत्यंत उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक बताया। 

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