शहर के गणमान्य लोगों ने शिक्षक प्रोफेसर अमीनुद्दीन काजी को दी श्रद्धाजंलि
खुलासा न्यूज,बीकानेर। राजकीय डूंगर महाविद्यालय के प्रताप सभागार में आज सायं मध्यकालीन इतिहास के प्रख्यात शिक्षक प्रोफेसर अमीनुद्दीन काजी की श्रद्धांजलि सभा अत्यंत भावपूर्ण वातावरण में आयोजित हुई।
सभा में शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों और शहर के गणमान्य नागरिकों की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही। तीन पीढिय़ों को नि:शुल्क शिक्षा देने वाले प्रोफेसर अमीनुद्दीन काजी को याद करते हुए लगभग सभी वक्ताओं की वक्ताओं की आंखें नम हो गईं। मंच पर उनकी सादगी भरी तस्वीर रखी थी, जो पूरे माहौल को असाधारण आत्मीयता दे रहे थे। सभा की शुरुआत उनके प्रिय शिष्यगण द्वारा उनकी छवि पर पुष्पांजलि अर्पित की। इसके बाद मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।
सर्वप्रथम पूर्व महापौर मकसूद अहमद ने भावुक होकर कहा कि प्रोफेसर व्यास ने उन्हें केवल शोध नहीं सिखाया, बल्कि जीवन जीने की गरिमा भी दी। उन्होंने बताया कि आर्थिक संकट के दिनों में प्रोफेसर अमीनुद्दीन काजी ने महीनों तक उनकी फीस और पुस्तकों का खर्च स्वयं उठाया था, लेकिन कभी इसका उल्लेख तक नहीं किया।
महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. राजेंद्र पुरोहित ने कहा, "प्रोफेसर अमीनुद्दीन काजी हमारे संस्थान की वह जीवित परंपरा थे जिन्होंने इस महाविद्यालय को केवल शिक्षण संस्था नहीं, बल्कि वैचारिक संस्कार केंद्र बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। उनके जाने से एक ऐसा अध्याय समाप्त हुआ है जिसकी छाया आने वाली पीढिय़ों तक बनी रहेगी।
पूर्व मंत्री प्रो बी डी कल्ला ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रोफेसर अमीनुद्दीन काजी ने शिक्षा को सामाजिक न्याय का माध्यम माना। उन्होंने कहा, वे उन शिक्षकों में थे जिन्होंने इतिहास को केवल राजाओं और युद्धों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि किसानों, स्त्रियों और साधारण जन के संघर्षों को भी कक्षा के केंद्र में लाया। उनके लिए शिक्षा लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत थी।" उन्होंने यह भी कहा कि प्रोफेसर अमीनुद्दीन काजी का घर जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए हमेशा खुला रहता था। पश्चिम विधायक श्री जेठानंद व्यास ने उन्हें भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का सच्चा अध्येता बताया। उन्होंने कहा, "उन्होंने भारतीय इतिहास को आत्मगौरव के साथ पढ़ाया। वे विद्यार्थियों को बताते थे कि इतिहास केवल अतीत नहीं, राष्ट्र की स्मृति है। अनुशासन, संस्कार और कर्मनिष्ठा उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी।" उन्होंने कहा कि प्रोफेसर काजी ने शिक्षण को साधना की तरह जिया।
पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल ने अपने संबोधन में कहा कि प्रोफेसर काजी ने शिक्षा में बराबरी की भावना को सबसे अधिक महत्व दिया। उन्होंने कहा, "उन्होंने कभी छात्र की जाति, आर्थिक स्थिति या पृष्ठभूमि नहीं देखी। उनके लिए हर विद्यार्थी केवल विद्यार्थी था। समाज के वंचित वर्गों के अनेक युवाओं को उन्होंने नि:शुल्क मार्गदर्शन देकर आगे बढ़ाया। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा सामाजिक योगदान है।
प्रो प्रभा भार्गव ने कहा, "आज विश्वविद्यालयों में शोध की चर्चा बहुत होती है, लेकिन शोध की नैतिकता का जीवंत उदाहरण यदि किसी में देखा तो वह प्रो अमीनुद्दीन काजी थे। उन्होंने विद्यार्थियों को उद्धरण नहीं, बौद्धिक ईमानदारी सिखाई।"
वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र जोशी ने कहा कि ,"वे इतिहास पढ़ाते थे, लेकिन उनकी भाषा में साहित्य की करुणा और मनुष्य की गंध थी। उनसे बातचीत करना किसी दुर्लभ पुस्तकालय में प्रवेश करने जैसा अनुभव होता था।"उन्होंने प्रो अमीनुद्दीन काजी के नाम से प्रतिवर्ष एक विद्यार्थी को इतिहास सम्मान देने की घोषणा की।
बसपा के अताउल्लाह खान ने कहा, उन्होंने कभी धर्म, जाति या विचारधारा की दीवारें नहीं देखीं। उनके घर का दरवाजा हर जरूरतमंद विद्यार्थी के लिए खुला रहता था। ऐसे लोग समाज को चुपचाप बड़ा बनाते हैं।
पश्चिम विधायक जेठानंद व्यास ने कहा कि भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का सच्चा अध्येता बताया। उन्होंने कहा, "उन्होंने भारतीय इतिहास को आत्मगौरव के साथ पढ़ाया। वे विद्यार्थियों को बताते थे कि इतिहास केवल अतीत नहीं, राष्ट्र की स्मृति है। अनुशासन, संस्कार और कर्मनिष्ठा उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी।"
भाजपा नेता गोकुल जोशी ने कहा, कि"वे उन विरले शिक्षकों में थे जिनकी कक्षा खत्म होने के बाद भी छात्र घंटों उनके साथ चलते रहते थे। उनकी बातों में सूचना कम, दृष्टि अधिक होती थी।"
शिक्षाविद् प्रोफेसर कांतिलाल माथुर ने कहा, "उन्होंने लड़कियों की शिक्षा को हमेशा विशेष महत्व दिया। कई छात्राओं को उन्होंने परिवारों से बात कर उच्च शिक्षा जारी रखने के लिए प्रेरित किया। यह काम किसी आंदोलन से कम नहीं था।"
नगर के वरिष्ठ अधिवक्ता मुमताज अली भाटी ने कहा, "उनके भीतर अद्भुत संयम था। वैचारिक मतभेद होने पर भी उन्होंने कभी संवाद की गरिमा नहीं छोड़ी। आज के समय में यह सबसे दुर्लभ गुण है।"
इतिहासकार प्रो भँवर भादानी ने कहा, "वे इतिहास को सत्ता के दस्तावेज की तरह नहीं, समाज की स्मृति की तरह देखते थे। लोक इतिहास और मौखिक परंपराओं पर उनका आग्रह अपने समय से बहुत आगे का था।"
महाविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हनुमान चौधरी ने कहा, "हमने उन्हें कभी मंचों की राजनीति करते नहीं देखा। वे सीधे छात्रों के बीच रहते थे। किसी विद्यार्थी की फीस से लेकर पुस्तक तक की चिंता वे निजी जिम्मेदारी की तरह करते थे।
नगर के वरिष्ठ सत्यप्रकाश आचार्य ने राजस्थानी भाषा में अपनी बात रखते हुए कहा, "उनका व्यक्तित्व जितना विद्वान का था, उतना ही विनम्र भरे नैसर्गिक मनुष्य का भी। वे जब बोलते थे तो लगता था ज्ञान किसी ऊंचे आसन से नहीं, जीवन के अनुभव से निकल रहा है।"
इतिहास विभाग के प्रभारी प्रो चंद्रशेखर कच्छावा ने उनकी उपस्थिति को महत्त्वपूर्ण बताया। उन्होंने सबका आभार जताया।
सभा में मौजूद अनेक पूर्व विद्यार्थियों ने अपने संस्मरण साझा किए। किसी ने उन्हें "चलता-फिरता पुस्तकालय" कहा तो किसी ने "इतिहास का संत "। कई वक्ताओं ने कहा कि आज के समय में जब शिक्षा तेजी से बाज़ार की ओर बढ़ रही है, प्रोफेसर व्यास जैसे शिक्षक मूल्यों और मानवीय प्रतिबद्धता की दुर्लभ मिसाल बनकर याद किए जाएंगे।
कार्यक्रम के अंत में शहर के विभिन्न शिक्षण संस्थानों की ओर से यह घोषणा की गई कि इतिहास विषय में उत्कृष्ट शोध करने वाले विद्यार्थियों के लिए "प्रो. अमीनुद्दीन काजी स्मृति छात्रवृत्ति" प्रारंभ की जाएगी। श्रद्धांजलि सभा के बाद बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने उनकी तस्वीर के सामने अपनी पुरानी नोटबुकें और शोध प्रतियां रखकर उन्हें अंतिम नमन किया।
सभा का समापन उनके ही प्रिय वाक्य के सामूहिक उच्चारण से हुआ —
"ज्ञान का अर्थ केवल जानना नहीं, मनुष्य होना है।"
शोक सभा का संचालन प्रख्यात पत्रकार नासिर जैदी ने किया।
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