बीकानेर में असंभव को संभव करती सर्जरी: नांगल कैंसर हॉस्पिटल में 46 वर्षीय महिला को मिला नया जीवन
बीकानेर में असंभव को संभव करती सर्जरी: नांगल कैंसर हॉस्पिटल में 46 वर्षीय महिला को मिला नया जीवन
बीकानेर। चिकित्सा विज्ञान में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं, जब कुशलता, साहस और समर्पण मिलकर चमत्कार का रूप ले लेते हैं। ऐसा ही एक अद्भुत उदाहरण बीकानेर स्थित श्रीमती ऊमा देवी भतमाल मेमोरियल नांगल कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट में देखने को मिला, जहाँ वरिष्ठ कैंसर सर्जन डॉ. जितेन्द्र नांगल के नेतृत्व में एक अत्यंत जटिल और जानलेवा सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम देकर 46 वर्षीय महिला मरीज को नया जीवन प्रदान किया गया।
हरियाणा के पलवल निवासी 46 वर्षीया जाहिदा के सीने के सामने धीरे-धीरे बढ़ती एक बड़ी गाँठ ने पूरे परिवार को चिंता में डाल दिया था। कई स्थानों पर दिखाने और सिटी स्कैन कराने के बावजूद कोई ठोस समाधान नहीं मिल पाया। समय के साथ गाँठ का आकार बढ़ता गया और स्थिति गंभीर होती चली गई। अंततः मरीज बीकानेर पहुँची और नांगल कैंसर हॉस्पिटल में परामर्श लिया।
यहाँ विस्तृत जाँच—सिटी स्कैन, एमआरआई और बायोप्सी—के बाद चौंकाने वाला खुलासा हुआ। मरीज को ऑस्टियोसार्कोमा, एक दुर्लभ और आक्रामक कैंसर, सीने की आगे की हड्डी स्टर्नम में था। गाँठ का आकार लगभग 15 x 15 सेंटीमीटर हो चुका था और यह दोनों ओर की पसलियों तक फैल चुका था। इतना ही नहीं, ट्यूमर के दबाव से मरीज का हृदय भी सीने की ओर दब रहा था और स्टर्नम का केवल निचला हिस्सा ही बचा हुआ था।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पहले दो चक्र कीमोथेरेपी दी गई, ताकि गाँठ का आकार कम किया जा सके। किंतु दुर्भाग्यवश इसका उल्टा प्रभाव पड़ा और ट्यूमर और अधिक बढ़ गया। ऐसे में चिकित्सा टीम ने स्पष्ट किया कि ऑस्टियोसार्कोमा का मुख्य और एकमात्र प्रभावी इलाज सर्जरी ही है, भले ही यह सर्जरी अत्यंत जोखिमपूर्ण क्यों न हो।
इसके बाद लिया गया निर्णय साहस, अनुभव और आत्मविश्वास का प्रतीक था—मरीज का ऑपरेशन किया जाएगा, चाहे जोखिम कितना ही बड़ा क्यों न हो।
इतिहास रचती सर्जरी
डॉ. जितेन्द्र नांगल के नेतृत्व में की गई यह सर्जरी चिकित्सा क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित हुई। ऑपरेशन का नाम ही इसकी जटिलता को दर्शाता है—
नीयर टोटल स्टर्नोटॉमी विथ बाइलेटरल चेस्ट वॉल रिसेक्शन, प्रोलीन मेष एंड बोन सीमेंट के साथ प्रोस्थेसिस रिकंस्ट्रक्शन तथा राइट लंग मेटास्टेक्टॉमी।
इस ऑपरेशन में लगभग पूरी स्टर्नम और दोनों ओर की पसलियों को निकालना पड़ा। ट्यूमर हृदय की पेरीकार्डियम से चिपका हुआ था और हार्ट को दबा रहा था। अत्यंत सूक्ष्मता और असाधारण सर्जिकल कौशल का परिचय देते हुए, सभी महत्वपूर्ण अंगों—हृदय और फेफड़ों—को सुरक्षित रखते हुए ट्यूमर को पूरी तरह निकाला गया। साथ ही फेफड़ों में मौजूद दो अतिरिक्त गांठों को भी सफलतापूर्वक हटाया गया।
रिकंस्ट्रक्शन: विज्ञान और कला का अद्भुत संगम
इतनी बड़ी मात्रा में चेस्ट वॉल हटाने के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी—फेफड़ों को फैलने के लिए आवश्यक नेगेटिव प्रेशर बनाए रखना। इसके लिए 30×30 सेमी के दो प्रोलीन मेष के बीच बोन सीमेंट डालकर मरीज के निकाले गए हिस्से के अनुरूप एक विशेष प्रोस्थेसिस तैयार किया गया। इस प्रोस्थेसिस को लगाया गया और ऊपर से दोनों ओर की पेक्टोरेलिस मेजर मसल्स को जोड़कर उसे सुरक्षित रूप से कवर किया गया। यह चरण न केवल तकनीकी दृष्टि से कठिन था, बल्कि सर्जिकल कला का उत्कृष्ट उदाहरण भी रहा।
ऑपरेशन के बाद की चुनौतीपूर्ण यात्रा
सर्जरी के बाद मरीज की ट्रेकियोस्टॉमी कर उसे वेंटिलेटर पर रखा गया। करीब 8 दिन तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर रहने के बाद, जैसे-जैसे मरीज की सांस लेने की क्षमता में सुधार हुआ, वैसे-वैसे सपोर्ट कम किया गया। इस नाजुक दौर में आईसीयू में मरीज की देखभाल में एनेस्थीजियोलॉजिस्ट डॉ. सुमन चौधरी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
आज मरीज सामान्य रूप से सांस ले रही है, सभी पैरामीटर सामान्य हैं और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। अब हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट के आधार पर आगे का उपचार नियोजित किया जाएगा।
टीमवर्क की जीत
इस सफलता के पीछे पूरी मेडिकल टीम का समर्पण रहा—
वरिष्ठ कैंसर सर्जन डॉ. जितेन्द्र नांगल, एनेस्थीजियोलॉजिस्ट डॉ. सुमन चौधरी, और समर्पित स्टाफ सदस्य जगदीश, प्रवीण, अंजली, शंकर सहित पूरी नर्सिंग एवं आईसीयू टीम।
यह केस न केवल डॉ. नांगल की असाधारण सर्जिकल दक्षता का प्रमाण है, बल्कि नांगल कैंसर हॉस्पिटल के उत्कृष्ट प्रबंधन, आधुनिक सुविधाओं और मरीज-केंद्रित दृष्टिकोण की भी सशक्त मिसाल है। बीकानेर से उठी यह सफलता की कहानी देशभर के कैंसर मरीजों के लिए आशा की नई किरण बनकर सामने आई है।
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