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भौतिकवादी युग में अधिकांश लोग धन, पद और प्रतिष्ठा को ही सफलता का मापदंड मानत:रामेश्वर लाल बिश्नोई

6 hours ago
भौतिकवादी युग में अधिकांश लोग धन, पद और प्रतिष्ठा को ही सफलता का मापदंड मानत:रामेश्वर लाल बिश्नोई


भौतिकवादी युग में अधिकांश लोग धन, पद और प्रतिष्ठा को ही सफलता का मापदंड मानत:रामेश्वर लाल बिश्नोई
बीकानेर। आज के भौतिकवादी युग में अधिकांश लोग धन, पद और प्रतिष्ठा को ही सफलता का मापदंड मानते हैं, लेकिन मेरे जीवन के लगभग 30 वर्षों का अनुभव यह बताता है कि वास्तविक संतोष न धन में है, न वैभव में, बल्कि निस्वार्थ सेवा में है। सेवा ही वह माध्यम है जो मनुष्य को आत्मिक शांति, सामाजिक सम्मान और जीवन का वास्तविक उद्देश्य प्रदान करती है। मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय समाज सेवा के कार्यों में लगाया है और आज पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि किसी जरूरतमंद व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाना ही मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मेरे पास प्रतिदिन अनेक लोग अपनी विभिन्न समस्याओं को लेकर आते हैं। कोई आर्थिक सहायता चाहता है, कोई प्रशासनिक समस्या के समाधान के लिए आता है, तो कोई सामाजिक या पारिवारिक परेशानी से जूझ रहा होता है। मेरा सदैव प्रयास रहता है कि जो भी व्यक्ति मेरे पास आए, वह निराश होकर वापस न लौटे। मेरी सामथ्र्य और क्षमता के अनुसार मैं हर संभव सहायता करने का प्रयास करता हूं। जब किसी व्यक्ति का काम पूरा हो जाता है और उसके चेहरे पर संतोष और खुशी दिखाई देती है, वही मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होता है। यही वह पूंजी है जिसे मैंने पिछले तीन दशकों में कमाया है।
मेरी सेवा यात्रा की शुरुआत अपने गांव में एक वृद्धाश्रम की स्थापना से हुई थी। समाज में ऐसे अनेक बुजुर्ग थे जिन्हें सहारे और सम्मान की आवश्यकता थी। उनकी सेवा करते हुए मुझे यह महसूस हुआ कि समाज में सेवा के अनेक क्षेत्र हैं, जहां कार्य करने की आवश्यकता है। इसके बाद धीरे-धीरे राज्य के विभिन्न जिलों में नशा मुक्ति केंद्र, पुनर्वास कार्यक्रम, जागरूकता अभियान, सामाजिक उत्थान समितियां तथा अन्य जनकल्याणकारी गतिविधियों की शुरुआत की गई। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल एक ही था कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक सहायता और सहयोग पहुंच सके। मेरा मानना है कि जब किसी एक व्यक्ति को लाभ मिलता है तो उसका प्रभाव केवल उसी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका पूरा परिवार उससे प्रभावित होता है। जब एक परिवार खुश होता है तो समाज में सकारात्मकता बढ़ती है। यही कारण है कि सेवा का प्रत्येक कार्य समाज निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होता है। सेवा केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि किसी को सही मार्गदर्शन देना, उसकी समस्या को सुनना, उसे न्याय दिलाने का प्रयास करना और उसे आत्मविश्वास प्रदान करना भी सेवा का ही रूप है।
सेवा के क्षेत्र में कार्य करते हुए अनेक प्रकार के अनुभव भी हुए हैं। कुछ लोग केवल यह परखने के लिए आते हैं कि यह व्यक्ति वास्तव में मदद कर सकता है या नहीं। कई बार लोग संदेह की दृष्टि से भी देखते हैं। लेकिन जब उनकी समस्या का समाधान हो जाता है, तब उनके मन में विश्वास पैदा होता है और वे दिल से आशीर्वाद देते हैं। मेरे लिए उन लोगों की दुआएं किसी भी पुरस्कार या सम्मान से अधिक मूल्यवान हैं।
समाज में ऐसे भी अनेक लोग हैं जो अपनी समस्याओं के समाधान के लिए विभिन्न कार्यालयों और प्रभावशाली व्यक्तियों के चक्कर लगाते रहते हैं। उन्हें केवल आश्वासन मिलता है, लेकिन वास्तविक सहायता नहीं मिल पाती। ऐसे लोग मानसिक रूप से परेशान और निराश हो जाते हैं। जब वे मेरे पास आते हैं तो मैं उनकी समस्या को अपनी समस्या मानकर उसका समाधान खोजने का प्रयास करता हूं। हर समस्या का समाधान तुरंत संभव नहीं होता, लेकिन ईमानदार प्रयास अवश्य किया जा सकता है। मेरा अनुभव है कि सच्ची नीयत और सेवा भावना से किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।
आज समाज में सेवा की भावना को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता और सामथ्र्य के अनुसार समाज के लिए कुछ न कुछ अवश्य करना चाहिए। यदि कोई गरीब, असहाय, बुजुर्ग, बीमार या जरूरतमंद व्यक्ति आपके पास सहायता के लिए आता है तो उसे यथासंभव सहयोग देना चाहिए। भगवान ने यदि हमें शिक्षा, शक्ति, संसाधन और अवसर दिए हैं तो उनका उपयोग केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के कल्याण के लिए भी होना चाहिए।
मेरा यही विश्वास है कि मनुष्य अपने साथ धन-संपत्ति नहीं ले जाता, लेकिन उसके अच्छे कर्म और सेवा भाव सदैव जीवित रहते हैं। लोगों की दुआएं, उनका विश्वास और उनके चेहरे की मुस्कान ही जीवन की वास्तविक कमाई है। पिछले 30 वर्षों की सेवा यात्रा ने मुझे यही सिखाया है कि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है और सेवा से प्राप्त संतोष ही जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में सेवा को स्थान दे, तो समाज अधिक संवेदनशील, सशक्त और खुशहाल बन सकता है। यही सच्चे अर्थों में मानवता की सेवा और जीवन की सार्थकता है।

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