राजस्थान की झाँकी में इस वर्ष नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर बीकानेर की उस्ता कला का होगा नायाब प्रदर्शन, देखे वीडियों
राजस्थान की झाँकी में इस वर्ष नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर बीकानेर की उस्ता कला का होगा नायाब प्रदर्शन, देखे वीडियों
बीकानेर। देश की राजधानी नई दिल्ली में इस वर्ष मनाये जाने वाले 77 वें गणतंत्र दिवस परेड समारोह में कर्तव्य पथ, पर निकाली जाने वाली विभिन्न झांकियों में राजस्थान की झाँकी में इस बार बीकानेर की उस्ता कला का प्रदर्शन किया जाएगा। राजस्थान ललित कला अकादमी के सचिव डॉ. रजनीश हर्ष ने बताया कि राज्य की उप मुख्य मंत्री और पर्यटन, कला एवं संस्कृति मंत्री दिया कुमारी, अतिरिक्त मुय सचिव प्रवीण गुप्ता तथा उप सचिव अनुराधा गोगिया के मार्गदर्शन में बनाई जा रही इस झाँकी में राजस्थान के उस्ता कलाकारों द्वारा की जाने वाली उस्ता कला का सजीव प्रदर्शन करने के साथ इनके उत्पादों का प्रदर्शन भी किया जाएगा। इस झाँकी की डिजाइन जाने माने कलाकार हरशिव शर्मा ने तैयार की है। झाँकी में रेगिस्तान के जहाज़ ऊँट के प्रदर्शन के साथ ही राजस्थान के मन भावन संगीत और पारंपरिक कलाकारों का नृत्य प्रदर्शन भी देखने लायक होगा। यह झाँकी गणतन्त्र दिवस परेड समारोह के मुय अतिथि, भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अन्य अतिथियों के सामने मुय मंच से गुजरेगा। डॉ. हर्ष ने बताया कि इस मनोहारी झाँकी का दिल्ली के परेड रोड स्थित कैंट के राष्ट्रीय रंगशाला परिसर में तैयार की जा रही है। नई दिल्ली के कर्तव्य पथ के बाद इस झाँको का दिल्ली के ऐतिहासिक लाल कि़ला पर 26-31 जनवरी तक आयोजित होने वाले भारत पर्व में भी प्रदर्शन होगा । यों मशहूर है उस्ता कला? उस्ता कला दुनिया में अपनी तरह की दुर्लभ कला है जो शुद्ध सोने की पाियों और उभरे डिज़ाइनों के साथ बनाई जाती है। यह बीकानेर की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है और समय के साथ इसमें नई तकनीक और कई उत्पाद भी विकसित हुए है। उल्लेखनीय है कि उस्ता कला राजस्थान के बीकानेर की अत्यंत विशिष्ट और पारंपरिक कला है जिसमें सोने की नक्काशी और गोल्ड एबॉसिंग का इस्तेमाल करके सुंदर डिज़ाइन बनाए जाते हैं। इस कला में मुय रूप से ऊँट चर्म, लकड़ी, पत्थर आदि पर बनाया जाता है। इसका नाम उस्ता शब्द से आया है, जिसका अर्थ होता है विशेषज्ञ या उस्ताद यानी एक कुशल कलाकार जिन्हें अपने काम में पारंपरिक महारत हासिल है और इनके उत्पाद बेजोड़ होते है। इस कला का इतिहास 16वीं सदी में शुरू हुआ, जब बीकानेर में उस्ता कलाकारों ने ऊँट की खाल पर जटिल डिजाइन विकसित किए। यह कला जूनागढ़ किले के अनूप महल, फूल महल आदि में भी देखी जा सकती है। इस कला में ऊँट की खाल पर सोने की मीनाकारी/गोल्ड एबॉसिंग का काम किया जाता है। इस कला में पर्शियन, मुगल और राजपूताना कला का सुंदर मिश्रण है।