खेलनी सप्तमी से धुलंडी तक दिन- रात हुड़दंग से सराबोर रहेगा शहर
कल करेंगे मां नागणेचेजी को गुलाल अर्पित
बीकानेर। बीकाणा में होली का आगाज कल से हो जाएगा। सोमवार को खेलनी सप्तमी पर शाकद्वीपीय समाज नागणेचीजी माता को फाग खेलाने के बाद गेर के रूप में शहर में प्रवेश करेगा। 2 से 10 मार्च तक पूरा शहर दिन-रात होली के हुड़दंग में सराबोर होगा। होलाष्टक से होलिका दहन तक हर दिन शहर में गेर, रम्मतें, डोलची मार खेल, भांग सम्मेलन, ठाकुरजी के साथ फूलों की होली और फागणिया फुटबॉल होगा। रम्मतों का दौर तक चलेगा। शहर में सबसे पहली रम्मत फक्कड़दाता की होगी, जो नत्थूसर गेट के अंदर लाला बिस्सा के घर के आगे होगी। इससे शुरू हुआ
खेलणी सप्तमी कल
शहर में होली का आगाज शाकद्वीपीय मग ब्राह्मण समाज के विधिवत रूप से मां नागणेची को गुलाल अर्पित करने के बाद ही होता है। रियासतकाल से चली आ रही इस परम्परा का निर्वाह आज भी निष्ठा के साथ किया जा रहा है। फाल्गुन सुदी सप्तमी (खेलनी सप्तमी) पर 2 मार्च को समाज के लोग नागणेची मंदिर में देवी माता की पूजा-अर्चना कर उनसे खुशहाली, सुख-शांति का आशीर्वाद लेेंगे। इसके बाद शहर में आठ दिन होली की मस्ती छाई रहेगी।
निकलेगी गेर
खेलनी सप्तमी से लेकर धुलंडी तक शहर में होली की मस्ती छाई रहेगी। शाकद्वीपीय समाज के लोग खेलनी सप्तमी के दिन अपराह्न बाद नागणेचेजी मंदिर में एकत्र होकर देवी माता का विशेष शृंगार करेंगे। पूजन-आरती के बाद भजनों की प्रस्तुतियां देंगे। साथ ही मंदिर में गुलाल उड़ाकर होली के आगाज की परम्परा का निर्वाह करेंगे। बाद में समाज के सभी लोग गोगागेट से गेर के रूप में शहर में प्रवेश करेंगे। यहां से चंग की थाप पर होली (गेवर) के पारम्परिक गीत गाते हुए सुपारी बाजार, मरुनायक चौक, बड़ा बाजार, सब्जी बाजार, नाइयों का मोहल्ला, मोहता चौक होते हुए मूंधड़ा सेवगों के चौक में पहुंचेंगे। इसके साथ ही परकोटे में होली की रंगत शुरू हो जाएगी। इसके बाद शहर के सभी वर्ग होली की मस्ती में शामिल हो जाएंगे।
थंब पूजन के साथ होलाष्टक होगा शुरू,नहीं होगें मांगलिक कार्य
होली के अवसर पर होने वाले आठ दिवसीय कार्यक्रमों का शुभारंभ शहर के विभिन्न मोहल्लों में सदियों पुरानी परंपरा के साथ होगा। थंब पूजन परंपरा के क्रम में मरूनायक चौक,कीकाणी व्यासों का चौक, लालाणी व्यासों का चौक, चौथाणी ओझा चौक व सुनारों की गुवाड़ में वेदोक्त मंत्रोचारण के साथ पहले भूमि पूजन, थंब शुद्विकरण व थंबस्थ देवताओं का पूजन कर थब रोपण किया जाएगा। ये थंब होलाष्टक में निश्चित स्थलों पर आठ दिनों तक रोपित रहेंगे। थंब पूजन के अवसर पर पारंपरिक रूप से चंग पर धमाल के साथ फ ाग गीतों का गायन होगा।

जोशी परिवार नहीं लगाते छौंक
होली की उमंग के साथ ही एक ओर जहां घरों में विभिन्न प्रकार के पकवानों की तैयारियां शुरू हो गई, वहीं पुष्करणा समाज की जोशी जाति वाले घरों में होलाष्टक लगने के साथ ही छौंक लगाने पर प्रतिबंध लग जाएगा।जोशी जाति में होलाष्टक शुरू होते ही सब्जियों सहित छौंक वाले सभी पकवान धुलंडी तक वर्जित रहेंगे। ऐसे में इस जाति वाले घरों में धुलंडी तक छौंक वाले व्यंजन-पकवान नहीं बन पाएंगे। इतना ही नहीं घरों में कपड़ों पर प्रेस करते वक्त भी यह ध्यान रखा जाता है कपड़े गीले होने पर छौंक की आवाज न आ जाए। छौंक पर प्रतिबंध के चलते कई घरों में जहां कच्ची दाल व बिना छौंक वाली सब्जियां बनेगी तो कई घरों में संगे-संबंधियों व रिश्तेदारों के यहां से विभिन्न प्रकार के पकवान आएंगे। सदियों पहले होली के दिन घटी एक अप्रिय घटना के बाद इस जाति वाले घरों में शुरू हुआ छौंक नहीं लगने का दौर लगातार जारी है। जोशी परिवारों के बुजुर्गों के अनुसार जोशी जाति के लोग होली दहन में काम आने वाली किसी भी सामग्री के हाथ तक नहीं लगाते। होली की परिक्रमा (ढूंढणा) नहीं करते। इतना ही नहीं इस जाति के लोग होली दहन की पहली लपट भी नहीं देखते। होलिका दहन के अंगारों पर दूसरों लोगों के घरों से आए पापड़ सेक कर व प्रसाद लेकर सतीमाता के मंदिर जाकर भूलचूक के लिए माफी मांगी जाती है। समाज के कई लोग अपने घर की दहलीज पर भी नारियल फोड़कर, प्रसाद चढ़ाते हैं और सतीमाता का ध्यान करने के बाद अपने घर में छौंक से बनने वाली सब्जी, पूडिय़ां तलना आदि कार्य किए जाते हैं।
इस जाति में सदियों पहले यह परंपरा कब शुरू हुई यह बताना तो मुश्किल है लेकिन होलाष्टक में छौंक नहीं लगाने के नियम का पालन कठोरता के साथ किया जाता है। बुजुर्ग बताते हैं कि यह नियम तोडऩे पर समाज में कई अनिष्ठ घटनाएं भी हुई है। यही कारण है कि घरों में लड़कों की शादी होने के साथ नई दुल्हन को भी छौंक नहीं लगाने के नियम का पालन समाज द्वारा करवाया जाता है।
यह है किवदंती
जोशी परिवार के पुत्र व बहू होलिका दहन के समय परिक्रमा (ढूंढणा) कर रही थी। महिला के अपने पति के साथ ढूंढणा करते वक्त ही पति होली अग्नि में गिर गया और उसकी मौत हो गई। इस हादसे से व्याकुल पत्नी ने भी इसी होली की अग्नि में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी और सती हो गई। समाज में इसी वर्ष के बाद जोशी जाति में होलाष्टक लगने से धुलंडी के दिन तक छौंक नहीं लगाया जाता।