संवेदनाहीनता की हुई परिकाष्ठा,सोशल मीडिया पर दुष्कर्म पीडि़ता की पोस्टपर मौन प्रशासन

खुलासा न्यूज, बीकानेर। आज का युग सोशल मीडिया का युग है। लेकिन इस युग में जीतना सोशल मीडिया का सदुपयोग है। उससे ज्यादा दुरपयोग होना शुरू हो गया है।  जिसको लेकर कानून भी बने है। परन्तु यह कानून महज दिखावे के तौर पर ही प्रतीत हो रहे है। जिसका ज्वलंत उदाहरण फेसबुक व वाट्सएप पर वायरल हो रही दुष्कर्म  पीडि़ता को न्याय दिलाने वाली वो पोस्ट है। जिसमें दुष्कर्म पीडि़ता की फोटो,नाम व उसके परिजनों के बारे में जिक्र किया गया है। इस पोस्ट में दुष्कर्म पीडि़ता को न्याय  दिलाने की बात तो की गई है। किन्तु उसकी पहचान छिपाने के कानून का जमकर उल्लंघन कर उसके परिजनों को ठेस पहुंचाने का काम भी किया जा रहा है। ऐसे पोस्ट  कर फेसबुकियों ने आरोपियो के प्रति खीस निकाली हैं और ऐसे आरोपियों को कठोर दंड देने की पैरवी कर समाज को जागरुक होने का संदेश दिया। पर पोस्ट करने वालो ने पीडि़ता ओर उसके परिजनों की पहचान उजागर कर सामाजिक प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दी। क्या कहता है कानून यौन हिंसा से बच्चों का संरक्षण कानून (पॉक्सो) की धारा 23 में यौन हिंसा के शिकार बच्चों से संबंधित मामलों की खबरें देने के बारे में मीडिया के लिए एक प्रक्रिया  निर्धारित है जबकि धारा 228 (ए) ऐसे अपराध में पीडि़त की पहचान का खुलासा करने के बारे में है। कानून में इस अपराध के लिए दो साल तक की कैद और जुर्माने की  सजा का प्रावधान है।भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराएं 376, 376 ्र, 376 क्च, 376 ष्ट और 376 ष्ठ व्यापक रूप से यौन उत्पीडऩ जैसे अपराधों को कवर करती हैं। इनमें से किसी भी धारा के तहत यौन हिंसा के शिकार हुए पीडि़त की पहचान उजागर करना दंडनीय अपराध माना जाता है. ऐसे मामलों में आईपीसी की धारा 228ए्र सबसे  ज्यादा प्रासंगिक है। दरअसल धारा 228 ्र यौन उत्पीडऩ के शिकार लोगों के नाम प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगाती है। वैसे कानून में एक ऐसा प्रावधान भी है, जिसके तहत  यौन उत्पीडऩ के शिकार व्यक्ति का नाम उजागर किया जा सकता है। प्रशासन मौन सोशल मीडिया पर इस तरह की वायरल पोस्ट पर पुलिस और प्रशासन बिल्कुल मौन साधक बने बैठे हैं। पहचान उजागर करना उचित नही दुष्कर्म कर संगीन अपराध करने वालो को कठोर दंड मिले। ताकि पीडि़ता के परिजनों के साथ न्याय हो। पर सोशल मीडिया पर पीडि़ता ओर उनके परिजनों की पहचान उजागर करना उचित नही। इससे पीडि़त परिवार को ठेस पहुँचती हैं। रचना,सामाजिक कार्यकर्ता
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