धान मंडी में धान का घोटाला, फर्जी बिल काटकर लगा रहे सरकार को चूना - Khulasa Online

धान मंडी में धान का घोटाला, फर्जी बिल काटकर लगा रहे सरकार को चूना

बीकानेर. बीकानेर अनाज मंडी में फर्जी बिलों से माल बेचकर सरकार को करोड़ो को चूना लगाया जा रहा है। साथ ही फर्जी कूपन काटकर व कूपन के पीछे लिखकर साइन कर खाना खिलाया जा रहा है। ऐसे में अब मंडी प्रशासन का खेल सामने आने लगा है। इसके बाद मंडी प्रशासन व ठेकेदारों की मिलीभगत से बगैर कूपन काटे किसानों को खाना खिलाया जाता है। सोमवार को ही जब खुलासा को इस बारे में पता चला तो खुलासा टीम ने एक डमी व्यक्ति को भेजकर फर्जी बिल बनाकर दे दिया। उसके बाद जब वह व्यक्ति गेट नं 1 पर पास कटवाने के लिए गया तो उन्होंने बिना गाड़ी देखें बिल काट दिया और फिर जब व्यक्ति खाने के लिए कूपन कटवाने गया तो गेट पर बैठे व्यक्ति ने उसी बिल पर पीछे लिखकर अपना साइन कर दिया और बोला कि कैंटीन में जाकर बोल देना और दिखा देना। इस बिल की पर्ची पर पीछे दो व्यक्तियों व खाना खिला देना गेट नं 1 लिखा था और उसके बाद गेट पर बैठे व्यक्ति के साइन किए हुए थे। ऐसे में अब मंडी प्रशासन व ठेकेदार की मिलीभगत सामने आने लगी है। जिसमें किसान क लेवा योजना के तहत सरकार की ओर से इन किसानों को पांच रुपए में खाना खिलाया जाता है, लेकिन बगैर कूपन कटवाए इस कैंटीन में यहीं थाली 70 रुपए की पड़ती है। ऐसे में मंडी प्रशासन व ठेकेदार हर माह हजारों का फर्जी बिल बनाकर बजट उठवाते है। फर्जी कूपन काटकर मंडी के मुख्य गेट पर किसान अपने माल बेचन के लिए गेट पास जारी करवाता है। उससे एक कूपन किसान कलेवा योजना के तहत एक कूपन दिया जाता है। जिसमें पांच रूपए में किसान को सरकार खाना खिलाती है। बाकी किसान कलेवा योजना को बाकी पैसे मंडी समिति देती है। जो निर्धारित रेट का ठेका होता है। जिसमें मंडी में किसान एक या दो कूपन कटवाकर खाना खाते है बाकी किसानों के मंडी गेट प्रभारी व किसान कलेवा योजना के ठेकेदार मिलकर फर्जी कूपन काटकर मंडी को चूना लगा रहे है इससे राजस्व नुकसान हो रहा है। ऐसे में हर माह 70 से 80 हजार रुपए फर्जी कूपन के माध्यम बिल उठाते है और सरकार को चूना लगा रहे है। इस समय मूंगफली के सीजन में सबसे ज्यादा कूपन जारी किया जाता है। करीब पांच माह तक सबसे ज्यादा कूपन जारी होते है। जिसमें किसानों को अभी तक पता नहीं है कि सरकार की ओर से इन किसानों को पांच रुपए में खाना खिलाते है जबकि कलेवा योजना के ठेकेदार की मनमानी के चलते पांच रूपए का खाना 70 रुपए में खिलाया जाता है। जो किसान मंडी में आते है उस किसान को किसान कलेवा योजना के न पता होने पर दुकानदार स्वयं अपनी जेब से किसान को खाना खिलाते है। इस संबंध में कई किसानों से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि हमारे नाम से कूपन तो कटे है लेकिन हमें इस योजना व भोजन के बारें में पता ही नहीं है। किसान अपनी उपज को लेकर मंडी आते हैं। अधिकतर किसान दूर-दराज के इलाकों से अपनी उपज को बेचने के लिए टै्रक्टर-ट्रॉली, जुगाड़ और अन्य साधनों से मंडी पहुंचते है। मंडी में आने के बाद कि सान के पंजीयन से लेकर जिंस के बेचान की प्रक्रिया पूरी होने में काफी समय लगता है। इसलिए भूखे पेट आए किसानों को मंडी यार्ड में रूक कर भोजन करना पड़ता है। किसानों को सस्ता व पौष्टिक भोजन मण्डी यार्ड में ही उपलब्ध कराने की मंशा से सरकार ने किसान कलेवा योजना शुरू की। जिसके तहत मंडी में आने वाले किसानों और हम्मालों को पांच रूपए में भोजन उपलब्ध करवाने का प्रावधान किया था। हालांकि किसानों के लिए परोसी जाने वाली थाली की कीमत कागजों में हर साल अलग-अलग दर्ज की जाती है, लेकिन उनसे महज पांच रुपए ही लिए जाते है। शेष राशि का भुगतान मण्डी समिति की ओर से अनुदान के रूप में करने की सरकार ने व्यवस्था की गई है। उल्लेखनीय है कि मंडी समिति की ओर से किसान कलेवा की कैंटीन संचालित करने के लिए ठेकेदार को टेंडर दिया गया है। कैंटीन में कम आते है किसान, गुणवत्ता पर उठ रहे सवाल किसान कलेवा योजना कैंटीन में किसान खाना खाने के लिए कम आते है। इसका पीछे कारण है कि मंडी प्रशासन की अनदेखी के चलते किसानों को गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगा है। खाने में गुणवत्ता नहीं होने से यहां किसान आते भी कम है।
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