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जयपुरः कोरोना की जंग जीतने वाले डायबिटिज के मरीजों के लिए ब्लैक फंगस के रूप में अब एक बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है. कोरोना का ट्रीटमेंट लेकर इन मरीजों ने संक्रमण को खत्म कर लिया, लेकिन इस दरमियान स्टेरॉयड के उपयोग से उनकी आंखों की रोशनी खत्म हो रही है, जी हां ये कोई हमारा आरोप नहीं, बल्कि राजधानी जयपुर के बड़े अस्पतालों में सामने आ रहे म्यूकोरमाइकोसिस यानी की ब्लैक फंगस के केसों की बानगी है. पिछले 15 दिनों की बात की जाए तो 50 से अधिक मरीज ऐसे चिन्हित किए गए है, जिन्हें एक या फिर दोनों आंखों से दिखना बन्द हो गया.इतना ही नहीं, कुछ मरीजों को फंगस दिमाग तक पहुंचे के चलते जिन्दगी से ही हाथ धोना पड़ा है. आखिर क्या है जिन्दगी को काला दंश देने वाली बीमारी और किस तरह मरीजों को झेलनी पड़ रही दिक्कतें,

 

केस स्टेडी
1. हीरालाल सैनी: 15 अप्रेल को कोरोना पॉजिटिव आए, उपचार के दौरान स्टेरॉयड लिया, लेकिन 10 मई को अचानक एक आंख से दिखना बन्द हो गया…..फिलहाल एक निजी अस्पताल में उपचार के लिए पहुंचे है. यहां चिकित्सकों ने बताया कि उन्हें म्यूकोरमाइकोसिस यानी की ब्लैक फंगस की दिक्कत है. इंजेक्शन की व्यवस्था हो जाएगी तो तत्काल राहत मिल सकती है.

2. अभय विजय: कोटा से जयपुर के एक निजी अस्पताल में उपचार ले रहे अभय विजय 16 अप्रेल को कोविड पॉजिटिव आए. 20 अप्रेल को अचानक उनके दाम में दर्द शुरू हो गया. परिजनों ने पहले तो डेंस्टिट को दिखाया लेकिन सूजन बढ़ना कम नहीं हुई. इसके बाद मरीज को जयपुर के एक निजी ईएनटी अस्पताल में भर्ती कराया गया. जांच में पता चला कि ब्लैक फंगस की वजह से जबड़ा खराब हो गया है. चिकित्सकों ने जबड़ा और तालवा निकाला, लेकिन शुक्र ये है कि इंफेक्शन आंखों तक नहीं पहुंचा. वरना जिन्दगीभर के लिए अंधता का शिकार होना पड़ता.

3. मुनाफ अली: 22 अप्रेल को कोरोना की वैक्सीन लगवाई थी….इसके दो दिन बाद से बुखार आया…..चिकित्सकों की सलाह पर एतियातन स्टेरॉयड लेना शुरू कर दिया…..लेकिन एक सप्ताह में ही जबदस्त साइड इफेक्ट देखने को मिला…..जयपुर के एक निजी अस्पताल में पहुंचे तब तक एक आंख से दिखना बन्द हो चुका था….संक्रमण रोकने के लिए आनन-फानन में एक आंख निकालनी पड़ी….

ब्लैक फंगस क्या है ?
आंख की नसों के पास में फंगस जमा हो जाता है, जो सेंट्रल रेटाइनल आर्टरी का ब्लड फ्लो बंद कर देता है. इससे अधिकांश मरीजों में आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली जाती है. इसके अलावा कई मरीजों में फंगस नीचे की ओर फैलता है तो जबड़े आदि को खराब कर देता है.

ब्लैक फंगस क्यों होता है?
कोरोना में दिए जाने वाले  स्टेरॉयड इम्युनिटी को और भी कम कर देते हैं. कई मरीजों में डायबिटीज हाईलेवल को पार कर जाती है, जिसका साइड इफेक्ट म्यूकोरमाइकोसिस के रूप में झेलना पड़ रहा है.

ब्लैक फंगस के लक्षण?
नाक खुश्क होती है. नाक की परत अंदर से सूखने लगती है व सुन्न हो जाती है. चेहरे व तलवे की त्वचा सुन्न हो जाती है. चेहरे पर सूजन आती है. दांत ढीले पड़ते हैं.

ब्लैक फंगस के मरीजों का इलाज?
इस फंगस व इंफेक्शन को रोकने के लिए एकमात्र इंजेक्शन लाइपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी आता है. कीमत 5 हजार रुपए है. मरीज को 6 लगते हैं. यदि इंफेक्शन बढ़ जाए तो पहले ऑपरेशन कर नाक-आंख के बीच के गले हुए हिस्से को निकाला जाता है और फिर दवाएं चलती हैं. ऑपरेशन भी काफी जटिल होता है.

ब्लैक फंगस का खतरा?
सात से आठ दिन में ही इलाज न हो और फंगस न निकाला जाए तो ब्रेन तक फंगस इंफेक्शन फैलना तय है. इसके बाद व्यक्ति को बचाना लगभग नामुमकिन है.

ब्लैक फंगस से बचाव?
कोरोना संक्रमण के दौरान कम से कम 4-5 दिन बाद डायबिटीज पेशेंट का फीडबैक लेकर संतुलित मात्रा में स्टेरॉयड देने चाहिए. शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य हैं, लोग ध्यान नहीं देते.

ब्लैक फंगस : इस वक्त की सबसे बड़ी दिक्कत
SMS अस्पताल में नेत्र रोग विभाग फिलहाल नहीं कार्यरत.
परकोटे के गणगौरी अस्पताल में चल रहा नेत्र रोग का ओपीडी.
ऐसे में निजी अस्पतालों में सर्वाधिक आ रहे ब्लैक फंगस के केस.
चिकित्सकों के मुताबिक कोरोना के इलाज में काम लिया जा रहा स्टेरॉयड.
इस स्टेरॉयड से कई मरीजों में शुगर लेवल हो रहा है हाई.
जिसके साइड इफेक्ट के रूप में सामने आ रही म्यूकोरमाइकोसिस बीमारी.
चिंता की बात ये कि इंफेक्शन रोकने के लिए एकमात्र इंजेक्शन की भी किल्लत.
डिमाण्ड बढ़ने पर बाजारों से गायब हुआ लाइपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन.
हालांकि,औषधि नियंत्रक संगठन ने टीमें बनाकर स्टॉक की शुरू की मॉनिटरिंग.
लेकिन अभी भी लोगों को उपलब्ध नहीं हो पा रहे ये इंजेक्शन.