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राज्यपाल के विधानसभा सत्र बुलाने को लेकर आनाकानी पर छिड़ी बहस
जयपुर। राजस्थान में अब सबकी निगाहें राजभवन पर टिक गईं हैँ। राजस्थान में कैबिनेट की सलाह के बावजूद राज्यपाल कलराज मिश्र विधानसभा सत्र नहीं बुला रहे। राज्यपाल कलराज मिश्र ने सोमवार को दूसरी बार विधानसभा सत्र बुलाने का राज्य मंत्रिमंडल की फाइल राज्य के संसदीय मामलों के विभाग लौटा दी। राजभवन ने सत्र बुलाने को लेकर कुछ और जानकारी मांगी है।देशभर में इस पर बहस छिड़ गई है कि राज्यपाल कलराज मिश्र का रुख क्या लोकतंत्र एवं संविधान की मूल भावना के अनुरूप है? इसी पर बीकानेर जिले से कई बार विधायक रहे पूर्व मंत्री एवं विधिवेत्ता मानिकचंद सुराणा ने अपनी बेबाक राय रखी है।सुराना का कहना है, विधानसभा सत्र बुलाने के लिए राज्यपाल की ओर से विधिक राय लेने का कथन पूरी तरह असंवैधानिक है। जब मुख्यमंत्री अपने विधायकों के साथ राजभवन जाकर राज्यपाल से मिल चुके। सभी विधायकों ने तत्काल सत्र बुलाने का आग्रह कर दिया।ऐसे में राज्यपाल का राजस्थान मंत्रिमंडल एवं विधायकों के आग्रह को तुरंत स्वीकार नहीं कर विधिक राय लेने की बात कहना सही नहीं है। कलराज मिश्र पहले राज्यपाल हैं जिन्होंने सत्र बुलाने के लिए विधिक राय लेने की बात कही है। गहलोत-पायलट विवाद का पटाक्षेप करने के लिए राज्यपाल को तुरंत सत्र बुलाना चाहिए।मुख्यमंत्री ने भी संविधान की शपथ ली है वे अमर्यादित भाषा कैसे बोले सकते हैं
बीकानेर सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल इससे इतर राय रखते हैं। मेघवाल का कहना है, सबसे पहले तो मुख्यमंत्री की यह बात आपत्तिजनक है कि जनता राज्यपाल को घेर सकती है। इस दौर में पहले भी ऐसी भाषा-शब्दावली का उपयोग कर चुके हैं जिन्हें एक मुख्यमंत्री के लिहाज से मर्यादित नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने कहा कि राज्यपाल के लिए संविधान की बाध्यताओं की बात करने वाले मुख्यमंत्री ने भी संविधान की शपथ ली है। इसे खाद रखना चाहिए। इसके अलावा आर्टिकल 163 (1) का हवाला देते हुए कैबिनेट की सलाह मानने की बाध्यता बताते हैं। आर्टिकल 163 (2) में राज्यपाल के पास विवेक की शक्ति भी है। संविधान ने उन्हें यह अधिकार दिया है। कोविड के हालात में सरकार सत्र क्यों बुलाना चाहती है, यह पूछना गलत नहीं है। वह भी उस स्थिति में जब मुख्यमंत्री कह रहे हैं उनके पास पूर्ण बहुमत है।
कैबिनेट की सिफारिश के बाद राज्यपाल को सत्र बुलाना ही होता है
वहीं लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचारी के अनुसार राजस्थान में कैबिनेट की सलाह के बावजूद राज्यपाल कलराज मिश्र विधानसभा सत्र नहीं बुला रहे। कैबिनेट की सिफारिश के बाद राज्यपाल को सत्र बुलाना ही होता है।संविधान के मुताबिक एक बार इनकार के बाद अगर कैबिनेट सत्र बुलाने की दोबारा मांग करती है तो, राज्यपाल मानने को बाध्य हैं। संविधान लागू होने के बाद 70 साल में पहली बार किसी राज्यपाल ने कैबिनेट की सलाह न मानकर सत्र बुलाने से इनकार किया है।
क्या हैं संवैधानिक प्रावधान
राज्यपाल सत्र बुलाने के लिए बाध्य हैं?
संविधान के अनुच्छेद-174 में प्रावधान है कि राज्य कैबिनेट की अनुशंसा पर राज्यपाल सत्र बुलाते हैं। इसके लिए वे संवैधानिक तौर पर बाध्य हैं और इनकार नहीं कर सकते हैं।
राजस्थान में क्या विकल्प हैं? राज्यपाल सिर्फ सुझाव दे सकते हैं कि कोरोना के कारण सत्र दो-तीन हफ्ते बाद बुलाया जाए। केंद्रीय कैबिनेट संसद सत्र का फैसला ले और राष्ट्रपति इनकार कर दें तो महाभियोग लाया जा सकता है। राज्यपाल के मामले में ऐसी व्यवस्था नहीं है। राज्य सरकार राष्ट्रपति से मदद मांग सकती है।