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बीकानेर। लोकसभा चुनाव को लेकर भले ही सियासी पारा चढ़ चुका हो,हर तरफ पार्टियों के जीत-हार के दावों का शोर हो,लेकिन मतदाता पूरी तरह मौन है। वोटरों की चुप्पी ने पार्टियों और प्रत्याशियों की बेचैनी बढ़ा दी है। प्रदेश के साथ जिले की सियासत को करीब से जानने वाले भी इस बार जनता का मूड नहीं भांप पा रहे हैं। खुफिया तंत्र भी किसी नतीजे पर पहुंचता नहीं दिख रहा है। सियासी समर में जीत का ऊंट किस करवट बैठेगा यह पता करने के लिए खुफिया तंत्र अब गांवों से इनपुट जुटाने में लग गया है।
सरकारों के कामकाज का आकलन करने में जुटे वोटर
प्रदेश की पुरानी और नई व केन्द्र की मोदी सरकार के कामकाज,योजनाओं से क्षेत्र और वहां रहने वाले जरूरतमंदों का कितना भला हुआ,मतदाता इस उधेड़-बुन में जुट गए हैं। लंबे समय बाद यह पहला लोकसभा चुनाव होने जा रहा है जब मतदाता केन्द्र सरकार के कामकाज के साथ ही प्रदेश की वर्तमान और पूर्व सरकार के कामकाज का आकलन कर रहे हैं। फिलहाल मतदाता के मन में क्या चल रहा है, वह अभी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। ऐसे में राजनीतिक के जानकारों को यह पता चलाने में मुश्किल हो रही है कि लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा। मुख्य राजनीतिक दलों (कांग्रेस-भाजपा) के कार्यकर्ता भी मतदाताओं की नब्ज टटोलने में जुटे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में संगठनात्मक कमजोरी
मुख्य पार्टियों की संगठनात्मक कमजोरी का असर ग्रामीण क्षेत्रों में साफ नजर आ रहा है। खुफिया सूत्रों की माने तो ग्रामीण विधानसभा क्षेत्रों में अनेकों गांव ऐसे हैं जहां पार्टियां कार्यकर्ताओं की कमी से जूझ रही हैं। कार्यकर्ताओं की एप्रोच न होने से इन गांवों में चुनावी लहर अभी तक नहीं बन पाई है। चुनावी चर्चा के लिए चौपाल तक नहीं लग रही।
रोजगार, गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा मुख्य मुद्दा
सूत्रों की माने तो कृषि ऋण, रोजगार, गरीबी, स्वास्थ्य चुनाव का मुख्य मुद्दा है। खासकर ग्रामीण मतदाता इन मुद्दों पर चर्चा कर अपना संतोष और असंतोष जाहिर कर रहे हैं। प्रत्याशियों को इन सवालों के जवाब लेकर मतदाताओं के बीच जाना होगा। वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा पर भी मतदाता सवाल-जवाब कर रहे हैं।
योजनाओं का कितना लाभ मिला
केन्द्र और राज्य सरकार की कई योजनाएं अधिकारियों की अदूरदर्शिता के कारण अंजाम तक नहीं पहुंच पाईं। जिन्हें लाभ मिला वे संबंधित सरकार का गुणगान करते नहीं थक रहे, लेकिन जो लाभ से वंचित रह गए उनकी नाराजगी साफ झलक रही है।
नहीं होती चर्चाएं
आम तौर पर हर चुनाव में देर रात तक मोहल्लों,चाय की दुकानों,पाटों पर चुनाव की चर्चाएं होती है। लेकिन मतदान में महज दस दिन बाकी है। किसी भी वर्ग में इस चुनाव को लेकर उत्साह दिखाई नहीं दे रहा है। आम मतदाता तो दूर पार्टी कार्यकर्ता भी किसी प्रकार की बहस चुनावों को लेकर नहीं हो रही है। केवल सोशल मीडिया के जरिये ही चंद लोग अपनी भड़ास निकाल रहे है। चुनावों को लेकर देर रात तक सजने वाली महफीले फिलहाल फीकी है।