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जिले के 1980 स्कूलों को सात माह से नहीं मिला भुगतान
बीकानेर। सेहत का गिलास हर बज्चे के हाथ के स्लोगन के साथ गत शिक्षा सत्र में शुरू की गई अन्नपूर्णा दूध योजना उधारी का दूध पीकर हांफने लगी है। बीकानेर जिले के 1980 स्कूलों का लगभग साढ़े चार करोड़ रुपए का भुगतान बकाया पड़ा है और अगले एक माह में भुगतान होने की उम्मीद नहीं लगाई जा रही है, जबकि अधिकांश स्कूलों ने पीईईओ के माध्यम से उधार दूध लेने में असमर्थता जता दी है। ऐसे में अगस्त माह में दूध योजना पर संकट मंडराने लगा है।
तत्कालीन भाजपा सरकार के कार्यकाल में गत वर्ष मई माह में अन्नपूर्णा दूध योजना की शुरुआत की गई। पहले सप्ताह में तीन दिन के लिए योजना लागू की गई और बाद में इसे पूरे सप्ताह के लिए लागू कर दिया। शुरूआत में योजना को लेकर अग्रिम बजट जारी किया गया परन्तु राज बदलने के साथ ही दूध योजना के भुगतान का संकट शुरू हो गया है।
करोड़ों का पुराना भुगतान
हालांकि राÓय सरकार ने दो माह पहले दूध योजना के नाम पर जिलेवार करोड़ों रुपए का बजट जारी किया था लेकिन वह भुगतान चुनाव आचार संहिता व गत सरकार के कार्यकाल का बकाया था। वर्तमान सरकार के कार्यकाल में बहुत कम स्कूलों को ही अन्नूपूर्णा दूध योजना के तहत भुगतान हो पाया है।
कहीं दूध के नाम पर जहर तो नहीं पिला रहे
जिले में केमिकल युक्त दूध का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। ग्राम पंचायत स्तर पर प्रतिदिन सैंकड़ों लीटर दूध स्कूलों की आवश्यकता बन गया है, जबकि अधिकांश पंचायतों में दुधियों के पास पुराने संसाधन ही मौजूद है। ऐसे में सवाल उठता है कि दो वर्ष पहले जहां पंचायतों में दूध की किल्लत थी, वहीं अब सैंकड़ों लीटर दूध स्कूलों में पहुंचने लगा है। हालांकि राÓय सरकार ने दूध की जांच के लिए ग्लाइकोमीटर की खरीद करवाई है लेकिन वह केवल दूध का फेट ही बताती है। के मिकल का दूध के साथ मिश्रण हुआ है या नहीं। इसकी जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम एक बार भी स्कूलों में नहीं पहुंची है।
शीघ्र मिले भुगतान
शिक्षकों का कहना है कि पोषाहार का भी समय पर भुगतान नहीं होता है। अब दूध का हजारों रुपए का भुगतान शिक्षक जेब से कर चुके हैं। शीघ्र भुगतान नहीं किया गया, तो स्कूलों में दूध योजना बंद हो जाएगी। शिक्षक नेता किशोर पुरोहित का कहना है कि स्कूलोंं में आपूर्ति होने वाले दूध की गुणवत्ता जांचने के लिए विभाग को स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर टीम बनानी चाहिए और रैंडम प्रणाली से स्कूलों की जांच करनी चाहिए, ताकि बज्चों के हाथ में सेहत का गिलास पहुंचना सुनिश्चित हो। पुरोहित का कहना है कि दूध योजना के लिए अग्रिम बजट जारी किया जाए, ताकि शिक्षकों को संचालन में परेशानी न हो।