अगर आपको भी नशे की हद तक पब्जी या किसी इंटरनेट ऐप गेम का चस्का है तो आपके लिए जरूरी है कि आप इंटरनेट गेम एड‍िक्शन के बारे में जानें. मनोचिक‍ित्सक इस तरह की आदत को इंटरनेट गेमिंग एडि‍क्शन नाम की मानस‍िक बीमारी में शामिल कर चुके हैं. ये आज की बहुत बड़ी मानसिक समस्या बन चुकी है. अगर आप भी इस मानसिक समस्या के श‍िकार हैं तो आप इसके बारे में विस्तार से जानें और इस आदत से कुछ इस तरह छुटकारा पाने की कोश‍िश करें. IHBAS (Institute of Human Behaviour and Allied Sciences) के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ ओमप्रकाश कहते हैं कि बीते कुछ साल से इंटरनेट एडिक्शन की समस्याएं बढ़ी हैं. मनोचिकित्सा में अब इसे एक बीमारी IGD यानी इंटरनेट गेमिंग डिसऑर्डर कहा जाता है. इस डिसऑर्डर का श‍िकार लोगों में अनिद्रा, अवसाद सहित आत्महत्या के विचार जैसे सिंप्टम्स भी द‍िखते हैं. दवाओं और काउंसिलिंग के जरिये इसका इलाज किया जाता है.डॉ ओमप्रकाश बताते हैं कि रिसचर्स अब तकनीकी के अध‍िक उपयोग से पैदा समस्याओं पर दिलचस्पी ले रहे हैं. इसमें इंटरनेट का अधिक उपयोग और विशेष रूप से वीडियो गेमिंग शामिल हैं. इस पर बहस जारी है कि क्या इन समस्याओं को मानसिक विकारों के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए. ज्यादा देर तक वीडियो गेम खेलने वालों में IGD जैसे मानसिक विकार पैदा होते हैं. अमेरिकी मनोरोग एसोसिएशन के पांचवें संस्करण में इसके लक्षणों के बारे में विस्तार से दिया गया है. इसमें दिया गया है कि IGD के लिए नौ संभावित लक्षण नशीले पदार्थों के इस्तेमाल या जुआ खेलने वालों के लक्षणों से मिलते जुलते हैं. इन लक्षणों में आपका चाहकर भी खुद को खेलने से रोक न पाना, टॉलरेंस, महत्वपूर्ण काम छोड़कर भी खेल में मशगूल होना, कोई समस्या होने पर भी गेम जारी रखना शामिल है. अपने खराब मूड को सही रखने के लिए गेमिंग का सहारा लेना और गेमिंग के कारण अपने रिश्तों या अवसरों (जैसे, शैक्षिक, करियर) को खतरे में डालना या खोना. मनोचिकित्सक कहते हैं कि IGD की तरह ही इंटरनेट एडिक्शन भी कई तरह की अन्य मानसिक बीमारियों की वजह बनता है. इनमें डिप्रेशन, एंजाइटी, ऑब्सेसिव कंपल्सिव सिंप्टम्स और एग्रेशन खास हैं. इस लत से आपके या आपके बच्चे की द‍िनचर्या पर असर पड़ता है. ऑफिस या स्कूल में कार्यक्षमता पर असर, नींद में कमी, परिवारिक कलह, समाज से कट जाते हैं. डॉ ओमप्रकाश ने बताया कि अभी आईजीडी या इंटरनेट की लत का श‍िकार लोगों के लिए ऐसी कोई दवा विकसित नहीं की गई है. लेकिन ये लत छोड़ने पर कई बच्चों या किशोरों में सबसे ज्यादा विदड्रॉल स‍िम्प्टम्स आते हैं. ऐसे सिंप्टम्स को काउसिलिंग या पहले से मौजूद कुछ दवाओं के जरिये ट्रीट किया जाता है. डॉ ओमप्रकाश ने कहा कि पबजी या इंटरनेट के कई अन्य गेम हिंसा पर आधारित होते हैं. इस तरह के गेम खेलने से छोटे बच्चों में नकारात्मकता बढ़ती है. इसमें सबसे बड़ी जिम्मेदारी माता-पिता और अभ‍िभावकों की होती है कि वो अपने बच्चों को इन गेम्स का श‍िकार न होने दें. वहीं आज आंकड़ों के अनुसार युवा पीढ़ी के बच्चे भी इस तरह के गेम का श‍िकार हैं, उन्हें काउंसिलिंग और अन्य हॉबीज में डालकर गेमिंग की लत से बाहर लाया जा सकता है.