बीकानेर। संगीत को भाषा की जरुरत नहीं, सात सुर ही संगीत हैं। स्वर और ताल के मिलन से ही संगीत की उत्पति होती है। यह विचार नोखा रोड स्थित सेठ तोलाराम बाफना अकादमी में आयोजित प्रेसवार्ता में पं. विश्वमोहन भट्ट ने व्यक्त किए। पं. भट्ट ने बताया कि संगीत में लगातार सुधार हो रहा है, लेकिन सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह संगीत के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम उठाए। राजस्थान में पुराने वाद्य यंत्र आदि का संरक्षण एवं संवर्धन हो इसके लिए प्रभावी योजना बनाना आवश्यक है।
*पं. विश्वमोहन की अनुपम देन है मोहनवीणा*
भारतीय एवं पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के अनूठे सम्मिश्रण की मोहनवीणा पं. विश्वमोहन भट्ट की देन है। सीइओ डॉ.वोहरा ने बताया कि 20 तारों वाली इस मोहनवीणा की विशेषता यह है कि इसमें तंत्रकारी और गायन दोनों अंगों का समावेश है। इससे भी आगे विश्ववीणा भी इजाद करेंगे जिसमें 35 तारों का समावेश है।
*संगीत का महारथी है भट्ट परिवार*
300 वर्षों से संगीत को सेवा और साधना को ही धर्म व कर्म मानने वाले भट्ट परिवार की चार पीढिय़ां संगीत के क्षेत्र में महारथी माने जाते हैं। पं. विश्वमोहन भट्ट को पद्मभूषण, पद्मश्री, ग्रैमी के साथ-साथ नाटक अकादमी, म्यूजिक, साइंटिस्ट, राष्ट्रीय तानसेन सम्मान, तंत्री सम्राट, राजस्थान रत्न एवं दो बार ग्लोबल म्यूजिक अवार्ड के अलावा अन्य कई सम्मानों से नवाजा गया है। रशिया की प्रतिष्ठित सेंट पीटरबर्ग यूनिवर्सिटी ने पं. भट्ट को ऑनेररी डॉक्ट्रेट की उपाधि से भी नवाजा है। पं. भट्ट के पुत्र भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत को सात्विक वीणा की सौगात देने वाले सलिल भट्ट हाल ही में ग्लोबन इंडियन की उपाधि से विभूषित हुए हैं। सलिल भट्ट देश के प्रथम संगीतज्ञ हैं जिन्हें कैनेडियन ग्रैमी अवार्ड काा नॉमिनेशन प्राप्त है। साथ ही भारत के प्रथम ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने जर्मनी के पार्लियामेंट में 2005 में सात्विक वीणा वादन किया, आईसलैंड जैसे सुदुररवर्ती देश में वहां की सांसद एवं तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति के लिए वीणा वादन किया।