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बीकानेर। एक ओर तो शहर सफाई में अपनी रैंकिग सुधारने की कवायद में जुटा है। वहीं दूसरी ओर हर बार की तरह इस बार भी निगम में महापौर को विपक्षी पार्षदों के साथ साथ अपने ही पार्षदों से दो दो हाथ करने पड़ रहे है। जिसका प्रत्यक्ष नजारा मंगलवार को शहर की सफाई व्यवस्था के लिये निगम भंडार में लंबे समय से पड़ी स्विपिंग मशीन के शुभारंभ अवसर पर देखने को मिला। जब महापौर अपने समर्थक दो तीन पार्षदों के साथ इस उद्घाटन अवसर पर मौजूद रही। मजे की बात ये है कि जहां कांग्रेसी पार्षद कार्यक्रम में निमंत्रण नहीं देने का विरोध तो जता ही रहे थे। वहीं भाजपा के पार्षद भी दंबे स्वरों में इस आयोजन के निमंत्रण में सम्मान सहित नहीं बुलाने पर नाराज थे। बताया जा रहा है कि जिन भाजपाई पार्षदों ने सुशीला कंवर को महापौर बनाने में एकजुटता दिखाई। उनको महज वाट्सएप ग्रुप द्वारा निम ंत्रण देना उचित समझा गया। मंजर ये रहा कि उपमहापौर राजेन्द्र पंवार को भी वाट्सएप ग्रुप में ही कार्यक्रम में आने का न्यौता मिला। ऐसे में निगम परिसर में यह चर्चा का विषय बना हुआ था कि आखिर निगम को कौन चला रहा है।
निर्धारित था कार्यक्रम फिर भी सूचना नहीं
बताया जा रहा है कि अनेक भाजपाई व कांग्रेसी पार्षदों ने इस बात को लेकर आपति जताई की वे शहर की सफाई और विकास को लेकर निगम बोर्ड के साथ है। लेकिन किसी राजनेता को खुश करने के लिये आयोजित कार्यक्रम में मान सम्मान के साथ पार्षदों को निमंत्रण न देना दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे में आधे से ज्यादा पार्षदों को तो इस आयोजन का भी पता नहीं है। वहीं आयोजन के दौरान केन्द्रीय मंत्री के विरोध के दौरान महापौर के ससुर द्वारा पार्षदों के साथ की गई धक्का मुक्की पर भी कांग्रेसी पार्षदों ने रोष जताया। कांग्रेसी पार्षदों का कहना है कि महापौर के ससुर की निगम में दखल अंदाजी से न केवल निगम के अधिकारी बल्कि कार्मिक भी खासे परेशाान है।
स्टांप रह गई महापौर
अपने साथ हुई बदतमीजी पर नाराज महापौर पद की प्रत्याशी रही अंजना खत्री का कहना है कि पहली बार एक महिला महापौर को बीकानेर की जनता ने आशीर्वाद दिया। लेकिन आज भी निगम में पुरुष ही इनकी पहचान बने हुए हैं। जब यह जीत कर महापौर बनी तो महिला पार्षदों को ऐसा लगा कि अब महिला पार्षद खुलकर अपनी बात महापौर से कर पाएंगी। परन्तु अफसोस सुशीला कंवर भी एक स्टांप बन कर रह गई है। यहां भी इनके ससुर गुमानसिंह राजपुरोहित व पति विक्रम की शह पर ही कामकाज हो रहा है। जीतने के बाद सुशीला का तो सिर्फ नाम रह गया है,महापौर के नाम पर इनकी पहचान गौण होती जा रही है। इनके पति और इनके ससुर ही पंच बने रहते हैं।